Friday, 22 January 2016

"कलम उठायी है मैंने तो कुछ न कुछ लिखुँगा...
दर्द का बहता दरिया आसुओं का सैलाब लिखुँगा...

ना-इन्साफी जुल्मो सितम का हिसाब लिखुँगा...
दबेकूचलों को देकर जुबाँ इक जवाब लिखुँगा...

काँटो का बिस्तर और पत्थर का सरहाना है...
तपती धूपका मुसाफिर हूँ कैसे छाँव लिखुँगा...

बेबस, लाचार ओ कमजोरोंका चुसतें जो लहू...
कत्ल को उनके गूनाह नही मैं सवाब लिखुँगा...

मज़हब औ जात की नफरत फैलाने वालोंको...
साधु या मूल्ला नहीं मैं तो जल्लाद लिखुँगा...

निकलेंगे मायने अमनके जो पढो़ गीता कुराण...
इत्तेहाद के तहरीक को इबादत औ आदाब लिखुँगा...

देखकर जूल्मो सितम चूप रहती है जुबाँ ...
जिनकी दारा होके रुस्तम हो उसे तो कायर लिखुँगा...
लहू जम गया हो जिस्ममें तो भला क्या कीजिए...
बगावत न करे फिर वो क्या सिपाही लिखुँगा...

मजदूरके पसीनेकी जो देखी थी चमक एकबार...
हिरेकी दमकको अब यहां क्या मै खाक लिखुँगा...

भलेही तुम छीनलो ये दस्ते दवात मुझसे 'साहील'...
डुबोकर क़लम अपने लहूमे इन्कलाब लिखुँगा...!!!"

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